अलीराजपुर। भील एवं मालवा अंचल की समृद्ध जनजातीय एवं लोक परंपराओं, अनुष्ठानों तथा उनसे जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियों को समझने, संरक्षित करने और दस्तावेजीकृत करने के उद्देश्य से 08 एवं 09 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, क्रांतिकारी शहीद छितुसिंह किराड़ शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अलीराजपुर के सभागार में दो दिवसीय परिसंवाद का हुआ शुभारंभ

परिसंवाद का केंद्रीय विषय “चौमासे के जनजातीय एवं लोक अनुष्ठान: सांस्कृतिक स्मृति और अभिप्राय” है। आयोजन में विशेष रूप से भील एवं मालवा अंचल की लोक-सांस्कृतिक परंपराओं, अनुष्ठानों, लोकविश्वासों तथा उनके सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों पर केंद्रित विमर्श हुआ। यह आयोजन जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, भोपाल द्वारा प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, क्रांतिकारी शहीद छितुसिंह किराड़ शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अलीराजपुर के सहयोग से किया जा रहा है।

परिसंवाद के संबंध में जानकारी देते हुए निदेशक डॉ. पारे ने कहा कि किसी एक स्थान पर एकत्र होकर किसी लोक देवी-देवता का किसी उद्देश्य से पूजन किया जाना अनुष्ठान कहलाता है। इन अनुष्ठानों को केवल जानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनके पीछे निहित चेतना और सांस्कृतिक भाव को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि “जब भी जीवन में सुख आए तो उसे बांटकर खाना चाहिए और दुःख आए तो उसे अकेले सहना चाहिए—यही जनजातीय संस्कृति की विशेषता है।”

महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. मीना सोलंकी ने अकादमी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अब तक इन अनुष्ठानों के नाम ही सुने थे, लेकिन आज उन्हें प्रत्यक्ष और जीवंत रूप में देखकर जनजातीय संस्कृति को जानने और समझने का अवसर मिल रहा है। इससे विद्यार्थियों और उपस्थित लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

वक्ता श्री कादू सिंह डुडवे ने भीली समुदाय में वनस्पतियों से जुड़े विश्वासों और पारंपरिक ज्ञान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की भाजियां पाई जाती हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी और पोषक होती हैं। उन्होंने बताया कि स्थानीय समुदाय इन वनस्पतियों के गुणों और उपयोगों का पारंपरिक ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखता आया है।

वक्ता सुश्री श्वेता ने भीली पिठोरा का रंगीन चित्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति को पूजनीय मानता है। उन्होंने बताया कि पिठोरा अनुष्ठान तीन दिनों तक चलता है। पहले दिन गायना होता है, दूसरे दिन पिठोरा का समग्र चित्रण किया जाता है तथा अंतिम दिन सभी रिश्तेदारों को आमंत्रित कर पारंपरिक पूजा-अनुष्ठान संपन्न किया जाता है।

वक्ता सुश्री मनीषा ने भील-भिलाला समाज में बांस के सदुपयोग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बांस का उपयोग अनेक अनुष्ठानों, रीति-रिवाजों तथा दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों में किया जाता है। इस प्रकार बांस जनजातीय जीवन और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

परिसंवाद की अध्यक्षता कर रहे श्री सुरेंद्र कुमार बारिआ ने चौमासा के अनुष्ठानों में जातर अनुष्ठान के महत्व पर जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि भील समाज में कुछ अनुष्ठान सामूहिक रूप से संपन्न होते हैं, जबकि कुछ अनुष्ठान परिवार एवं घर की परंपरा के अनुसार किए जाते हैं। इन अनुष्ठानों में सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक स्मृति का विशेष महत्व है।

‘दिवासा’ की गायना प्रस्तुति ने किया भावविभोर

दिवासा अनुष्ठान की सामूहिक गायना प्रस्तुति देते हुए श्री बहादुर वेया जी ने बताया कि बाबा देव की आराधना के लिए दिवासा अनुष्ठान किया जाता है। उन्होंने कहा कि इसका गायना “हर-हर महादेव” के उद्घोष से प्रारंभ होता है और अंत में पुरखों की स्मृति के साथ इसका समापन होता है। प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने अनुष्ठान की सांस्कृतिक चेतना और सामुदायिक भाव को ढाक वादन से जीवंत किया।

‘गाज माता’ अनुष्ठान की संगीतमय प्रस्तुति

मालवा की लोक संस्कृति को प्रस्तुत करते हुए श्रीमती पूर्णिमा जी ने समूह के साथ गाज माता अनुष्ठान की संगीतमय प्रस्तुति दी। प्रस्तुति में राजा, रानी और भिलनी रानी के साथ गाज माता के पात्रों का प्रभावशाली अभिनय रहा, जिसने उपस्थित दर्शकों का मन मोह लिया। पारंपरिक गायन, अभिनय और लोक-अभिव्यक्ति के समन्वय ने मालवा की जीवंत लोक-सांस्कृतिक परंपरा का परिचय कराया।

कार्यक्रम के अंत में आभार व्यक्त करते हुए डॉ. सज्जन सिंह मौर्य ने कहा कि महाविद्यालय में इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन निरंतर होते रहना चाहिए, ताकि विद्यार्थी अपनी लोक एवं जनजातीय संस्कृति को करीब से जान और समझ सकें। उन्होंने कहा कि मालवा की सांस्कृतिक पहचान यहां की समृद्ध वनस्पतियों, लोक परंपराओं और जनजातीय अनुष्ठानों से गहराई से जुड़ी हुई है। जनजातीय समाज ने बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बीच भी अपनी परंपराओं एवं अनुष्ठानों की मूल पहचान को बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन इन जीवंत परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उनके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जनजातीय प्रदर्शनी में दिखी समृद्ध सांस्कृतिक की विरासत

परिसंवाद के साथ महाविद्यालय परिसर में जनजातीय प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें भील एवं भिलाला समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में पारंपरिक भीली आभूषणों, स्थानीय वनस्पतियों, भाजियों एवं पारंपरिक व्यंजनों को आकर्षक ढंग से सजाया गया। प्रदर्शनी के माध्यम से जनजातीय समाज के पारंपरिक जीवन, खान-पान, प्रकृति से जुड़ाव और भीली चित्रों की झलक देखने को मिली। विद्यार्थियों एवं उपस्थित लोगों ने प्रदर्शनी का अवलोकन कर जनजातीय जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों को करीब से जाना |उक्त जानकारी संस्कृति विभाग द्वारा दी गई |